• शनीश मणि मिश्र

क्या यही है सबका साथ सबका विकास?


क्या यही है सबका साथ सबका विकास अखिर भेदभाव क्यूँ ओलंपिक्स और पैराओलंपिक्स में एक कोच मेहनत बराबर कर्ता है। ब्लकि मै ये कहूँगा कि कोचों को दिव्यागं खिलाड़ियों पर अधिक मेहनत करना पड़ता है। लेकिन सरकार की नीतियों की वज़ह से या एक अधिकारी को सर्वेसर्वा बनाने की वज़ह से कोचों और सपोर्टिंग स्टाफ को वो सम्मान नही मिल रहा जो मिलना चाहिए। अब तो मुख्यमंत्री जी को समझना चाहिए कि अंशकालिक कोचों की जो मांग थी एकदम सही थी लेकिन वो अबतक नही समझे अब देश के सबसे बड़े कोच गौरव खन्ना जी का भी तिरस्कार उत्तर प्रदेश के खेल निदेशक और सरकार ने कर दिया। ये प्रदेश मे खेलों को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण है अगर ऐसे ही चलता रहा तो प्रदेश मे कोचों का अकाल पड़ जाएगा। मुख्यमंत्री जी आपके अधिकारी ने कितने गलत फैसले लिए ये बेशक आपको समझ नही आ रहा मैं बता देता हूं। पहला फैसला अंशकालिक कोचों को मानदेय न देना। दूसरा फैसला विभाग को आउटसोर्सिंग करना। तीसरा और सबसे बड़ा फैसला पैराओलंपिक्स के सपोर्टिंग स्टाफ का अपमान करना। इतना होने के बाद आप प्रदेश के खिलाड़ियों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना गलत है।


'लेखक लक्ष्मण अवार्डी एवं अंतराष्ट्रीय सॉफ्ट टेनिस खिलाड़ी हैं' (ये लेखक के निजी विचार हैं)