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बहुदिव्यांगता : एक परिचय

नीरज मधुकर। बहुदिव्यांगता एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति दो या दो से अधिक दिव्यांगताओं से प्रभावित हो जाता है, जैसे किसी को कुछ नयी चीजों को सीखने में समस्या है और साथ ही साथ अपने शरीर को अथवा वातावरण को नियन्त्रित करने, देखने, सुनने अथवा किसी अन्य तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है । इसमें एक साथ कई तरह की समस्या होने की वजह से व्यक्ति अपना दैनिक क्रियाकलाप भी बिना किसी की सहायता के नहीं कर पाता है । पूर्वांचल क्षेत्र में जापानी इन्सेफेलाईटिस अथवा एक्यूट इन्सेफेलाईटिस सिन्ड्रोम (ए.ई.एस.) की वजह से कई तरह की मानसिक तथा शारीरिक समस्याएँ देखने को मिल रही हैं । वर्तमान शोध के मुताबिक ए.ई.एस. की वजह से कई प्रकार की मनोवैज्ञानिक समस्याएँ जैसे चिडचिडापन, गुस्सा आना इत्यादि भी एक प्रमुख व्यवहार के रूप में सामने आया है ।

बहुदिव्यांगता के प्रकार

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अनुसार कुल 21 प्रकार की दिव्यांगताएँ चिन्हित की गयी हैं । इनके संयोग से कितने अलग-अलग प्रकार की बहुदिव्यांगताएँ हो सकती हैं इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । जैसे, देखने और सुनने की समस्या (बधिरान्धता), सुनने के साथ - साथ मानसिक समस्या अथवा देखने, सुनने एवं चलने की समस्या इत्यादि । इसमें स्थिति तब और ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब दिव्यांगजन के सामाजिक पहलुओं को इनके साथ समावेशित करके देखा जाये । माता-पिता की पढाई का स्तर । उनकी सामाजिक –आर्थिक स्थिति, परिवार का स्वरुप इत्यादि का बहुत ही ज्यादा प्रभाव बच्चे के विकास पर पड़ता है ।

क्यों होती है बहुदिव्यांगता ?

इसके कारणों को मुख्यतः तीन भागों में बांटा जा सकता है


जन्म के पहले के कारण:

क) माता की उम्र कम होना

ख) कुपोषण

ग) माता द्वारा धूम्रपान अथवा नशा का सेवन (फीटल अल्कोहल सिन्ड्रोम)

घ) गर्भावस्था में कोई गंभीर बीमारी का होना

ङ) गर्भकाल में कोई दुर्घटना

च) अत्यधिक मानसिक तनाव

छ) माता को मधुमेह, उच्च रक्तचाप अथवा कोई गंभीर बीमारी का होना

ज) सामान रक्त वर्ग में शादी होना

झ) वंशानुगत समस्या इत्यादि


जन्म के दौरान के कारण :

क) असुरक्षित प्रसव का होना

ख) प्रसव के दौरान कोई संक्रमण अथवा किसी दुर्घटना का होना

ग) प्रसव काल का लम्बा होना

घ) प्रसव के समय अत्यधिक रक्तस्राव हो जाना

ङ) बच्चे का उल्टा जन्म लेना आदि


जन्म के बाद के कारण:

क) जन्म के तुरंत बाद न रोना (सबसे अधिक प्रभाव डालता है)

ख) समय पर टीकाकरण न होना

ग) कोई दुर्घटना अथवा मानसिक तनाव (अवसाद)

घ) किसी गम्भीर बीमारी का होना

ङ) दवा अथवा किसी ड्रग का नकारात्मक प्रभाव पड़ना इत्यादि

बचाव के क्या हैं तरीके?

इससे बचने के लिए सरकार की तरफ से कई कदम उठाये गए हैं, जैसे :

क) समय पर टीकाकरण

ख) पल्सपोलियो अभियान

ग) अस्पताल आधारित प्रसव को बढ़ावा देना

घ) जन्म के तुरंत बाद शिशु को माता का गाढ़ा पीला दूध पिलाने की आवश्यकता पर बल देना

ङ) आयोडीनयुक्त नमक की बिक्री करना (आयोडीन की कमी से मानसिक समस्या तथा घेघा रोग होता है)

च) मातृ शिशु कल्याण कार्यक्रम

छ) पोषाहार योजना (ताकि कुपोषण का प्रभाव न पड सके)

ज) संचारी रोग नियन्त्रण कार्यक्रम (विशेषकर पूर्वांचल क्षेत्र में)

झ) जेनेटिक काउन्सलिंग प्रोग्राम इत्यादि


यदि बच्चे में फिर भी कोई समस्या हो तो क्या करें?

ऐसी परिस्थिति में पास के किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, आशा वर्कर, जिला अस्पताल अथवा किसी दिव्यांग पुनर्वास केन्द्र से सम्पर्क उचित सलाह ले सकते हैं । घबराएँ नहीं, आपके द्वारा दी गयी जानकारी इन संस्थानों में हमेशा सुरक्षित रखी जाती है । दिव्यांगता की पहचान जितनी जल्दी हो जाये, उतना बेहतर है । पहचान के बाद यह संभव है कि मामूली उपचार से उसके प्रभावों को कम किया जा सकता है । बाद में स्थिति नियन्त्रण से बाहर हो सकती है ।

*क्या बहुदिव्यांग बच्चे की पढाई –लिखाई संभव है?*

बहुदिव्यांग बच्चों की पढाई के लिए विशेष तौर पर “व्यक्तिगत शिक्षण योजना” का निर्माण किया जाता है । हालाँकि प्रत्येक बहुदिव्यांग बच्चा अपने आप में विशिष्ट होता है किन्तु फिर भी इसके लिए कुछ विशिष्ट शैक्षणिक रणनीतियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे “हैण्ड अंडर हैण्ड” अथवा “हैण्ड ओवर हैण्ड” विधि, वातावरण में आवश्यक परिमार्जन, विशिष्ट सहायक उपकरणों का उपयोग, विशेष अधिगम सामग्री का उपयोग, उनकी शेष देखने, सुनने, अथवा स्पर्श करने की क्षमता का उपयोग शामिल है । यदि बच्चे को देखने में समस्या होती है, तो इसके लिए ब्रेल अथवा टॉकिंग बुक बेहतर विकल्प हो सकता है । भारत सरकार की तरफ से एडीप योजना के अन्तर्गत इसके लिए निःशुल्क सहायक उपकरण प्रदान करने का भी प्रावधान है ।


इसके लिए जनपद स्तर पर समग्र शिक्षा अभियान कार्यालय, दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग, जिला दिव्यांग पुनर्वास केन्द्र, जिला शीघ्र हस्तक्षेपन केन्द्र, बचपन डे केयर सेन्टर अथवा राज्य स्तर पर “समेकित क्षेत्रीय कौशल विकास, पुनर्वास तथा दिव्यांगजन सशक्तीकरण केन्द्र (सी.आर.सी.) से संपर्क किया जा सकता है । इन संस्थानों में उच्च स्तरीय गुणवत्तायुक्त पुनर्वास सेवाएँ उपलब्ध हैं ।

क्या बहुदिव्यांग व्यक्ति रोजगार कर पाता है?

एक पुनर्वास व्यावसायिक का पहला लक्ष्य उसे दैनिक क्रियाओं में आत्मनिर्भर बनाना होता है । यदि शीघ्र पहचान तथा हस्तक्षेपन प्रारम्भ हो जाता है, तो यह हमेशा संभव होता है कि माता –पिता के व्यवसाय में वह व्यक्ति भी हाथ बटाये । यदि दिव्यांगता की गंभीरता कम है और प्रशिक्षण बेहतर मिल रहा है, तो वह व्यक्ति भी रोजगार कर सकता है । इसके लिए परिवार तथा समाज को सहयोगी की भूमिका में सदैव रहना होगा । केंद्र तथा राज्य सरकारों की तरफ से दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण देने के साथ-साथ रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा रहे हैं । दिव्यांगजनों हेतु सरकारी नौकरियों में 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है । उक्त के आलावा स्व-रोजगार के लिए भी सरकारी स्तर पर सहायता प्रदान की जाती है जिसके लिए स्थानीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग से संपर्क किया जा सकता है ।


लेखक परिचय:

नीरज मधुकर

सहायक प्राध्यापक (विशेष शिक्षा)

सी.आर.सी. – गोरखपुर